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यह भाषा भी अपनी है
वह भाषा भी अपनी है
जब पूरे विश्व को घर
मान लिया तो फिर
“तोर, मोर “क्या ?
भोजन, वस्त्र, आवास, रक्षा
माँगे आप किसी भी भाषा में,
समझ लेती वसुधा की भाषा।
जैसे शेरनी या कोई भी मॉं,
पाल लेती
किसी के भी बच्चे को
अपनी अंकों में।
इसीलिए तो कहते हैं
मातृभाषा, मदर टंग
या मादरी जुबान
क्योंकि भाषा के नहीं होते
खूनी पंजे या रक्तरंजित पहचान।
मॉं मॉं ही होती है बेटा।
ऐसी ही है अपनी हिंदी भाषा
जो सबकी है
जो किसी की भी नहीं।
श्रीकांत पाठक
